*प्रेम ही सभी भावों और विकारों का मूल है।*
जहाँ ईर्ष्या है, वहाँ भी कहीं न कहीं प्रेम ही छिपा होता है; जहाँ अहंकार है, उसकी जड़ में भी प्रेम ही होता है।
लेकिन जब प्रेम पूर्णतः *विकारों से मुक्त* हो जाता है, वही *भक्ति* बन जाता है।
तो यह शुद्ध भक्ति क्या है? कैसे अनुभव होती है?
आइए, इन गूढ़ रहस्यों को समझते हैं *पूज्य गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी* के दिव्य प्रवचन में—
🪷 *नारद भक्ति सूत्र* 🪷
No comments:
Post a Comment